Tuesday, 10 May 2016

फ़ना सी हो रही तहज़ीब.......

लखनऊ हमेशा से ही जाना गया है अपनी तहज़ीब के लिए ,वो सभ्यता जिसे हम गंगा-जामुनी तहज़ीब भी कहते है । वो तहज़ीब जो उत्तर भारत के गंगा और यमुना नदी के बीच में बसे मैदानी इलाकों में प्रचलित है। प्राचीन अवध इस तहज़ीब का केंद्रबिंदु रहा है और यहाँ के नवाब इसके अग्रणी। इस तहज़ीब में लोगो के अंदर दुसरो के प्रति असीम आदर और सेवा भाव होता था जो की शाब्दिक होने के साथ साथ उनके आचरण में भी शामिल था। अवधी तहज़ीब जिसे आज लखनवी तहज़ीब भी कहा जाता है वो काफी प्रचलित है और इसका ज़िक्र कई कहानियो और फिल्मों में भी हुआ है जैसे की उमराव जान जिसमे इस शहर की पुरानी विरासत का बखूबी प्रदर्शन किया गया है । जो आज इसके प्रचलन की मुख्य वजह है,जी हाँ प्राचीन अवध की इस धरोहर का अंगीकार यहाँ की तवायफों की बेशकीमती अमानत थी ।
इस शहर का बाशिंदा होने के नाते मैं यहाँ के माहौल से काफी हद तक परिचित हूँ।  बहुत फर्क है आज कि तहज़ीब में और उस लखनवी तहज़ीब में जो किताबों में कैद है और  एक नयी पश्चिम प्रभावित आधुनिक सभ्यता ने इसकी जगह ले ली है जिसमे गालियाँ देना आम मजाक का हिस्सा है और टेक्सटिंग की भाषा ने यहां की भाषा की नफासत को गायब कर दिया है। आज के लखनऊ ने उस तहज़ीब को मानो त्याग दिया है …… पूरी तरह तो नहीं लेकिन दुर्लभ हो गयी है वह तहज़ीब। मैंने शहर की भीड़-भाड़ में लोगो छोटी-छोटी बातों पर तुरंत अपना आपा खोते,अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखा है  .... अब तो बड़ा आम हो गया है ये सब।  ये वही शहर है जहाँ जनाब ,हुज़ूर और आप कर के संबोधित करने की सभ्यता थी और जहाँ नवाबों की ट्रेन छूट जाती थी पहले आप .... पहले आप के चक्कर में। ये भावना थी जो नवाबों द्वारा प्रचलित हुई जो हिन्दू,उर्दू ,फ़ारसी और अरबी सभ्यताओं के मिलान से बनी थी और आज इसकी मिठास लुप्त होने जैसी मालूम पड़ती है।
यह कैसे हो गया .... उस शहर में जो इतना शांतिप्रिय और शानदार आचरण का प्रत्यक्षीकरण करता था वो कुछ ही दशकों में अपनी पहचान खो देगा जो इसकी धरोहर है। शायद यह होना ही था इस शहर को बदलना ही था क्यूंकि कुछ भी स्थायी नहीं होता और समय परिवर्तन लाता ही है ,अवध जो इतनी परिपूर्ण सभ्यता रखता था वो अब उसे खो ही सकता था ……ये वही सभ्यता है जहाँ रूमी दरवाज़ा जैसा इतिहास पला है जिसे नवाब बारामबार  बनवाकर ज़मींदोज़ करवा देते थे सिर्फ इसलिए ताकि मज़दूरों को रोज़गार मिल सके। आज तो ऐसी पहल की उम्मीद भी नहीं की जा सकती और आज का माहौल काफी स्पर्धाओं से भरा है और लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और बरसों से चली आ रही सभ्यता को भूल बैठे हैं। आज इस सभ्यता का मजाक बन कर रह गया है लोग इसको बेवकूफी मानते हैं ,हमें आज ज़रूरत है इसे जीवित रखने की चाहे दूसरे लोग कैसे भी हो ,या ये सोच लीजिये ये हमारी सभ्यता है और इसकी महत्ता हमे ही समझनी होगी क्यूंकि अगर हम ही संशय में होंगे तो इसका फना हो जाना तय है। 

Monday, 20 April 2015

Television Rating Points

Television rating point is a tool used to judge which programs or channels are viewed the most. This determines the choice and taste of people and also the popularity of a particular channel. For measurement purpose, a device is attached to the television sets in a few thousand viewers' houses for judging purpose. These numbers are treated as samples from the overall television owners in different geographic and demographic sectors. Basically this concept is based on sampling method of investigation of facts. It records the time and the programs that a viewer watches on a particular day. Then, the average is taken for a 30-day period, which gives the viewership status for a particular  channel.
Television rating point is one of the most widely used criterion by the advertisers to gauge the popularity of a channel or a program. With the launch of several news channels and general entertainment channels, the television viewership became highly cluttered. Targeting the audience is the main aim of various channels as they want maximum viewership to secure more and more advertisements which in turn will increase financial profitability. The channels in surge of viewership may modify contents to be broadcast as per the curiosity and interests of the audiences. This led to the emergence television rating points which helped to determine viewership habits of the audiences and capture their taste. The television rating points concept has had a huge impact on the television industry, advertisement pattern and structure, brand promotions, nature of content for broadcasting etc. The television consumption pattern in India is dominated by household mostly comprising of housewives, the target audience so the general entertainment channels mostly air female-centric shows having melodramatic content pleasing them. The peak hours being 8 to 10 pm is most preferred time-slot for advertisements due to maximum viewership will give maximum exposure to the brands having utility for the target audiences.
Based on the study of recent trend of television rating points, it is believed that all the news channels attain 6% rating points and the general entertainment channels attain 94% rating points including sports, kids, informational and others channels and programs. Every aspect of the television industry is dominated by business; in order to entertain audience and produce rich content show, the channel and producers need able team of professionals and personnels, which would cost their purses and funds for the same are financed through advertisements. Only that channel can secure advertisements which has favorable rating points. So the television rating points measurements becomes critical for getting advertisements.
The television rating points is measured by electronic rating agencies namely INTAM,and DART in India. The former INTAM (Indian Television Audience  Management)  adopts two methods; namely, Frequency monitoring under which meters are installed in the homes as sample of the total population which gives a glimpse of the viewership habits of entire population.; and, secondly Picture matching is a new concept in which meters tracks pictures being watched by household which is later matched to interpret the channel name.
Though both the methods are not accurate and have some loopholes and shortcomings. The data collected from the samples are from top sixteen cities of nine states of India and it overlooked the lower-middle class and failed to differentiate television consumption habits of elite classes of urban areas and lower middle classes of rural areas. The other agency being DART (Doordarshan Audience Ratings Agency) is a diary based system of ratings, under which diaries are distributed in sample homes for recording the details of family members watching which programs and when.
Television Rating Points can only give a glimpse of a small sample and not the actual mood of population and it may lack the interests of minor sections of population but it somewhat helps in providing a skewed image of the channels and producers standing in the market. 

Sunday, 19 April 2015

फना सी होती तहज़ीब........

लखनऊ हमेशा से ही जाना गया है अपनी तहज़ीब के लिए ,वो सभ्यता जिसे हम गंगा-जामुनी तहज़ीब भी कहते है और ये वो तहज़ीब है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाके हैं जो गंगा और यमुना नदी के बीच में बसे  है। अवध इस तहज़ीब का केंद्रबिंदु रहा है और यहाँ के नवाब इसके अग्रणी। इस तहज़ीब में लोगो के अंदर दुसरो के प्रति असीम आदर और सेवा भाव होता था जो की शाब्दिक होने के साथ साथ उनके आचरण में भी शामिल था। अवधी तहज़ीब जिसे आज लखनवी तहज़ीब कहा जाता है काफी प्रचलित है और इसका ज़िक्र कई कहानियो और फिल्मों में भी हुआ है जैसे की उमराओ जान जिसमे शहर की पुरानी विरासत को दर्शाया गया है।
इस शहर का बाशिंदा होने के नाते मैंने यहाँ के माहौल से काफी हद तक परिचित हूँ।  बहुत फर्क है आज कि तहज़ीब में और उस लखनवी तहज़ीब में जो किताबों में कैद है और  एक नयी पश्चिम प्रभावित आधुनिक सभ्यता ने इसकी जगह ले ली है जिसमे गालियाँ देना आम मजाक का हिस्सा है और टेक्सटिंग की भाषा ने यहां की भाषा की नफासत को गायब कर दिया है। आज के लखनऊ ने उस तहज़ीब को मानो त्याग दिया है …… पूरी तरह तो नहीं लेकिन दुर्लभ हो गयी है वह तहज़ीब। मैंने शहर की भीड़-भाड़ में लोगो छोटी-छोटी बातों पर तुरंत अपना आपा खोते,अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखा है  .... अब तो बड़ा आम हो गया है ये सब।  ये वही शहर है जहाँ जनाब ,हुज़ूर और आप कर के सम्भोधित करने की सभ्यता थी और जहाँ नवाबों की ट्रेन छूट जाती थी पहले आप .... पहले आप के चक्कर में। ये भावना थी जो नवाबों द्वारा प्रचलित हुई जो हिन्दू,उर्दू ,फ़ारसी और अरबी सभ्यताओं के मिलान से बनी है। शायद इसी लिए इसमें इतनी मिठास और मधुरता है जो आज लुप्त हो रही है।
यह कैसे हो गया .... उस शहर में जो इतना शांतिप्रिय और शानदार आचरण का प्रत्यक्षीकरण करता था वो कुछ ही दशकों में अपनी पहचान खो देगा जो इसकी धरोहर है। शायद यह होना ही था इस शहर को बदलना ही था क्यूंकि कुछ भी स्थायी नहीं होता और समय परिवर्तन लाता ही है ,अवध जो इतनी परिपूर्ण सभ्यता रखता था वो अब उसे खो ही सकता था ……ये वही सभ्यता है जहाँ रूमी दरवाज़ा का इतिहास पला है जो नवाब बार बार बनवाकर तुड़वा देते थे सिर्फ इसलिए ताकि मज़दूरों को रोज़गार मिल सके। आज तो ऐसी पहल की उम्मीद भी नहीं की जा सकती और आज का माहौल काफी स्पर्धाओं से भरा है और लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और बरसों से चली आ रही सभ्यता को भूल बैठे हैं। आज इस सभ्यता का मजाक बन कर रह गया है लोग इसको बेवकूफी मानते हैं ,हमें आज ज़रूरत है इसे जीवित रखने की चाहे दूसरे लोग कैसे भी हो ,या ये सोच लीजिये ये हमारी सभ्यता है और इसकी महत्ता हमे ही समझनी होगी क्यूंकि अगर हम ही संशय में होंगे तो इसका फना हो जाना तय है। 

Wednesday, 8 April 2015

कहाँ ले जाएगा ये पहिया ........................................

पहिये का नाम जहन मे जब आता है तो एक तस्वीर सी दिमाग में ताज़ा हो जाती है .....एक बैलगाड़ी ,कच्चा रास्ता और उसमे लदा माल या धान जो चालक एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है बेचने के लिए । अब ये कार्य एक व्यक्ति जो चालक है वो भी अपने कंधों पर ढो सकता है लेकिन उसकी सीमाएं होंगी समय भी ज्यादा लगेगा, श्रम भी अधिक हो जाएगा उसके लिए । पहिये के आ जाने से जीवन के कार्य मे गति मिली है हमे ,कार्य करने  की क्षमता मे वृद्धि हुई और लक्ष्य को प्राप्त करना सफल हुआ ।
            उसी प्रकार जीवन मे आगे बढ्ने के लिए अपनी इच्छाए,उमंगों  और  महत्वाकांक्षाओं को पोषित करने मे हमे पहिये की जरूरत पड़ती है । आज के समाज मे शिक्षा को सफलता का पहिया माना गया है ,सही भी है क्यूंकी शिक्षा ही हमे योग्य और संतुलित बनाती है । सामन्य प्राथमिक शिक्षा तो सबका संवैधानिक अधिकार है , लेकी उच्च शिक्षा की महत्ता ज्यादा है । क्योंकि हाईस्कूल और इंटर मिडिएट तक तो शिक्षा केवल नंबर का खेल ज्यादा रहती है उसके बाद की शिक्षा ज्ञान अर्जित करने वाली होती है , और ये समय हमारे जीवन का वो समय है जब हम योग्य चालक बन रहे होते हैं यही से मिलती है हमारी जिंदगी को रफ्तार । अब विडम्बना ये है की हमारे हाथ मे सब कुछ तो नहीं या ये भी कह सकते है ,............ कि हमारे हाथ मे कुछ भी नहीं ...........क्योंकि बहुत कुछ निर्भर करता है ,हमारे परिवेश ,आर्थिक स्तिथि ,और शिक्षण संस्थान और प्रणाली पर । क्या ये मामले हमारी गाड़ी कि चाल  मे गति अवरोधक बने हुए हैं ? बहुत हद तक हाँ .......... ये चिन्हित कारणो से हमारी गाड़ी ना चाहते हुए भी रुकती है । हम किसी तरह से अपने परिवेश और आर्थिक जकड़न से पार पाकर आगे अग्रसर हो भी आए तो हम शिक्षण संस्थान और उनकी व्यवस्था के हवाले हो जाते हैं , जहां पर भी खतरा है ..... कई प्रकार के खतरे । कालेज और विश्वविद्यालयों मे प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को मेरिट ना व्के कारण बैरंग लौटा दिया जाता है ,और कई विश्वविद्यालय तो ऐसी कट ऑफ घोषित करते हैं जो बिलकुल निराधार है । इस कठिन पड़ाव को भी कुछ जुझारू छात्र पार भी कर ले तो लाचार शिक्षा प्रशासन और व्यवस्था का लुत्फ उठाने को मजबूर होते हैं ,वो और कर भी क्या सकते हैं ।
            लचरता और  ढीलेपन का आलम ये है की क्लास सुचारु रूप से नहीं चलती ,और छात्र अपने घर के आराम को छोडकर यहाँ रह रहे हैं पढ़ने के लिए तो वहाँ उनका स्वागत खाली क्लासेस करती हैं , शिक्षक तो आते नहीं ,और गलती से  आ गए तो टहल घूम रहे होते , या स्टाफ रूम  मे गप्प लड़ा रहे होते हैं ..........ऐसा मालूम पड़ता है की पढ़ाना उनका काम नहीं ,और पढ़ाने भी कभी आए तो टाइम पास करते हैं ,और 5-10 मिनट पढ़ा कर अहसान कर देते थे । दुख की बात ये भी है की कोई सुनवाई नहीं होती , और छात्रों मे भी रोष पैदा होता है ।
             और इसका दूसरा पहलू , छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति को लेकर है जहां सरकार गरीब छात्रों की पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार है , वही कालेज वाले और उससे संबन्धित अधिकारी मिल कर उसमे भी घपला कर जाते हैं जिससे गरीब छात्र उच्च शिक्षा से वंचित हो जाते हैं । इसमे दोष छत्रों का भी बराबर का होता है जो इसका विरोध ठीक से नहीं कर पाते हैं , टुंट पुजिए छात्र नेताओं के चककर मे पड़कर अपना भविष्य खराब कर देते हैं ।
             शिक्षा व्यवस्था के इस लचर स्वरूप को देखते हुए छात्रों के , कैरियर के सफर पर ग्रहण लगता जा रहा है । तो इस सफर का पहिया भी कमजोर होता जा रहा है । इस कमजोर पहिये के डैम पर देश कितनी प्रगति करेगा ये भी संशय है ।

Sunday, 8 March 2015

मेरी बात अंजली के साथ....











  आज है अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और महिलाओं को समर्पित इस दिन में जानते हैं आज की महिलाओं की राय एक महिला की जुबानी .जी हाँ, अंजली सिंह मेरी सहपाठी और दोस्त के साथ की गयी ढेर सारी छोटी-मोटी बातें और कई सवाल-जवाब जिनका इन्होने बड़ी बेबाकी से जवाब दिए और अपने जीवन के कुछ अच्छे और बुरे अनुभवों को हमारे साथ बाटा , पेश उनसे की गयी बातों के कुछ प्रमुख अंश .


  • आपके नाम से शुरू करते हैं तो कैसे पड़ा आपका नाम ?

मेरा नाम .... मेरे नाम की एक इंटरेस्टिंग कहानी है . पहले मेरा नाम शिखा था . लेकिन मुझे ये नाम अच्छा नहीं लगता था क्योकि सब लोग मुझे इस नाम से चिढाते थे . जैसे सिखड़ी सिक्कड़ ... तो सेंट्रल पब्लिक स्कूल आजमगढ़ में एडमिशन के समय मैंने अपना नाम खुद ही बदल लिया था और ये अंजली नाम रख लिया .जो कि कुछ कुछ होता है फिल्म से प्रेरित था .


  • इस नाम का मतलब क्या है ?

पहले तो मुझे नहीं पता था लेकिन नेट पर सर्च किया तो पाया की इसका मतलब होता है गिफ्ट टू गॉड. इस नाम से काफी नुकसान भी हुआ क्युकी हर एक्साम्स और प्रेजेंटेशन में आगे ही जाना पड़ता रहा है पर फिर भी ये नाम पसंद है मझे.


  • अपने परिवार के बारे में कुछ बताइए?

मेरे परिवार में मैं मेरे माँ पापा, दो छोटी बहनें और एक छोटा सा प्यारा सा भाई. मैं सबसे बड़ी हूँ. मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहोत ही साधारण है. एक मिडिल क्लास फॅमिली. मेरा होम टाउन मऊ और आजमगढ़ है.


  • हर परिवार में कोई एक सदस्य होता है जो सारे अहम् निर्णय लेता है आपके घर में वह कौन है? और उनका किस हद तक योगदान है आपके ज़िन्दगी के निर्णय में?

मेरे परिवार में मेरे पापा ही फैसले करते हैं. और रही बात मेरे ज़िन्दगी से सम्बंधित फैसलों की तो वह मैं ही लेती हूँ और मेरे पापा की पूरी सहमती रहती है. चाहे मेरी पढाई हो या करियर हो सब में मेरे माँ बाप का पूरा सहयोग और साथ होता है.


  • आपकी स्कूल लाइफ कैसी रही ? उससे जुड़े कोई किस्से ?

वैसे तो मेरी स्कूल लाइफ बहुत अच्छी थी मगर मम्मी पापा के पुलिस में होने के कारण मुझे बार बार अपना स्कूल बदलना पड़ा. इंटरमीडिएट तो घर पे ही रहकर किया . स्कूल के समय में दोस्ती तो बहुत हुई पर कोई परमानेंट नही रह पाए. फिर दो दोस्त सुमित और सुभाषिनी आज भी मेरे संपर्क में है और बहोत अच्छे दोस्त हैं.


  • स्कूल के बाद आगे की पढाई का फैसला और वो दौर कैसा रहा?

इंटरमीडिएट तक तो घर वालो के ही साथ रही. मेरा पसंदीदा विषय मैथमेटिक्स था और अभी भी है. मैं बी टेक करना चाहती थी मगर 12th  के अंत में मैंने पाया की बी टेक का स्कोप कुछ खास नहीं लगा और कुछ अलग करने की चाह में मेरा झुकाव बी कॉम ऑनर्स की तरफ हो गया. इंटरमीडिएट के बाद एक साल का गैप भी हो गया था क्योकि उस समय मेरे माँ बाप का ट्रान्सफर हो रहा था तो कुछ दिक्कत आ गयी थी. मगर मैंने अपना समय बर्बाद न करते हुए ICA  DIPLOMA का कोर्स कर लिया. फिर लखनऊ यूनिवर्सिटी में बी.कॉम ऑनर्स में दाखिला ले लिया.


  • लखनऊ विश्वविद्यालय में आपने दाखिला लिया मगर लखनऊ ही क्यों? कैसा रहा आपका ये फैसला?

जैसा कि मैंने बताया उस समय ट्रान्सफर की वजह से मेरा एक साल का गैप हुआ उस समय मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के लिए भी अप्लाई किया था मगर जा नहीं पाई काउंसलिंग  के लिए फिर एक साल बाद जब सोचा की अप्लाई करू तो मेरिट ज्यादा होने के कारण लखनऊ विश्वविद्यालय आने का फैसला लिया और यहाँ पर आराम से एडमिशन हो गया.


  • लखनऊ जैसे बड़े शहर में आजमगढ़ से आने के बाद आपने क्या फर्क पाया और यहाँ के माहौल में कैसे ढाला ?

कुछ बहुत बड़ा फर्क नहीं पाया. मगर एडमिशन लेने के बाद मेरे दादा जी की डेथ हो गयी थी तो दो महीने बाद आई मैं. शुरुआत में थोडा दिक्कत हुआ घरवालों की बहोत याद आती थी रोती भी थी मगर धीरे धीरे दोस्त बनते गए और फिर सब अच्छा हो गया. इन सबमे सबसे पहले मेरी दोस्ती सौम्या से हुई आप तो उसे जानते ही हैं हमारी क्लासमेट. फिर उसके बाद वैशाली से हुई.  फिर तो हमारा इतना अच्छा ग्रुप बन गया की घर ही जाने का मन नहीं करता था.


  • हॉस्टल लाइफ के उतार-चढ़ाव बारे में आपका क्या कहना है ?

हॉस्टल लाइफ ... वैसे तो बहुत अच्छी थी मगर डर्टी पॉलिटिक्स भी बहोत हुए. लोग जुड़े अलग हुए, अच्छे बुरे सारे अनुभव हुए जैसे की 3rd  इयर के दौरान बॉयज हॉस्टल के लड़कों की बद्तमीज़ी बहुत बढ़ गयी थी. गंदे कमेंट्स और पत्थरबाजी रोज का काम हो गया था. हमने उसके खिलाफ अवाज़ भी उठाई मगर कुछ खास कदम नहीं उठाये गए और हमें ही दबा दिया गया. ओवरआल बहोत चुनौतीपूर्ण रहा हमारा हॉस्टल लाइफ फिर भी खूब मज़े किये जैसे मैगी पार्टी, घूमना फिरना , नाईट टॉक्स, जी डी, सब यादगार हैं.


  • ग्रेजुएशन तो हो गया. अब आगे JOURNALISM करने की कैसी सोची? और फ्यूचर प्लानिंग क्या है आपकी इस फील्ड में ?

मुझे याद है मेरे ग्रेजुएशन टाइम में मुझे एक असाइनमेंट मिला था. लखनऊ के  5 एन्तेर्प्रेनेउर का interview लेने का. असाइनमेंट के दौरान मुझे इन् लोगों के interview लेने में बहुत अच्छा महसूस हुआ तभी मेरे मन में एक और अलग मतलब जर्नलिज्म करने का ख्याल आया फिर परिस्थितियां बनती गयीं मुझे प्रोत्साहन मिलता गया और मैंने यह कोर्स ज्वाइन कर लिया. इस फील्ड में मैं P. R. ज्वाइन करना चाहूंगी.


  • P. R. ही क्यों ? 

पहले मैं P. R. के बारे में कुछ नहीं जानती थी फिर जागरण नॉएडा में काउंसलिंग के दौरान मुझे पता चला की यह गर्ल्स के लिए ज्यादा अच्छा हैं. स्कोप ज्यादा है. मुझे सेलिब्रिटीज के साथ रहना और फेमस होना है. मुझे लगता है की मैं इस फील्ड अच्छा कर सकती हूँ इसलिए.


  • अपने लाइफ के बारे में आपका क्या कहना है ? प्यार और दोस्ती के क्या मायने हैं आपके लिए ?

मेरी लाइफ.. मैं बहुत इमोशनल हूँ जल्दी सेंटी हो जाती हूँ. यह मेरी कमजोरी भी है और ताकत भी . मैं लोगों पे जल्दी भरोसा कर लेती हूँ . लोगों ने इसका फायदा भी उठाया लेकिन इसकी वजह से दोस्त भी अच्छे मिले जो अब तक मेरे साथ हैं... रही बात दोस्ती की तो दोस्ती बहोत अच्छे से निभाती हूँ. मेरे दोस्त मेरी ज़िन्दगी हैं.
और प्यार .... प्यार एक बहोत ही अच्छी चीज है अगर उसमे अंडरस्टैंडिंग, लॉयल्टी, और रेस्पेक्ट हो तो. और मुझे लगता है मैं प्यार के लिए नहीं बनी हु क्योकि दोस्ती तक तो ठीक है मगर कमिटमेंट मेरे से नहीं हो पाता. कुछ बुरे अनुभव रहें हैं.


  • आपका ड्रीम बॉय कैसा होना चाहिए ?

ड्रीम बॉय.. जैसा की बताया मैंने मेरे को समझे मेरी केयर करे और रेस्पेक्ट करे. लुक्स बहुत मैटर नहीं करता मेरे जैसा ही लुक्स हो. मेरे से पहले उसकी चाहे ८- १० गर्लफ्रेंड्स क्यों न हों लेकिन जब मेरे साथ हो तो केवल मेरे ही साथ हो, ईमानदार हो .


  • आप पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहीं हैं. एक छोटे शहर की लड़की को इतने मौके नहीं मिलते हैं. अब तक तो उनकी शादी के विचार बनने लगते हैं ऐसे में आपको कैसा लगता है ?

हाँ सही कहा आपने. एक छोटे शहर की लड़कियों को इतना मौका नहीं मिलता मेरे भी घर में मेरी शादी करने की पूरी योजनायें चल रहीं हैं लेकिन इन् सबमे मुझे मेरी पढाई को लेकर कोई कम्प्रोमाइज नहीं करना पड़ा. मेरे मम्मी पापा शादी ढूंढने के साथ साथ मेरी पढाई पर कोई रोक नहीं लगाया. हाँ मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता की मेरी शादी अभी हो क्युकी शादी के बाद पढाई का कोई मतलब नहीं और तब मैं अपने निर्णय खुद नहीं ले पाऊँगी. तो अभी मैं पढना चाहती हूँ फिर शादी. और मेरी दोनों बहने भी पढ़े. शादी तो होनी ही है जल्दी क्या है.


  • शिक्षा प्रणाली के बारे में आपका क्या मत है?

मेरे अनुसार हमारे देश में अभी भी पारंपरिक तरीके से पढाई होती है जिसमे बदलाव लाना जरुरी है. क्लासेज को और रोचक बनाने के तथ्यों को जोड़ना चाहिए जिससे स्टूडेंट्स का उत्साह बढे. जैसे प्रयोगात्मक पढाई पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. केवल लेक्चर क्लास से कुछ नहीं होगा. जैसे हमारे मुकुल सर . वो हमेशा कुछ ऐसे फैक्टर्स ढूंढ के रखते हैं अपनी क्लास में जिससे की स्टूडेंट्स का इंटरेस्ट बना रहता है.

  • आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है आज की महिलाओं के जीवन के बारे में आपका क्या कहना है ?

आज की महिलाएं मल्टी टास्किंग हैं. वो घर के साथ साथ देश और समाज के विकास में भी पूरा सहयोग दे रहीं हैं. इनको शशक्त बनाना जरुरी है. सबसे ज्यादा जरुरी है कि युवाओं की गलत सोच इनके प्रति बदले. अपने आस पास की महिलाओं का रेस्पेक्ट करना सीखें. रेस्पेक्ट करेंगे तो नजरिया भी बदलेगा.
औरतों को भी एक दुसरे के प्रति जिम्मेदार और समझदार होना चाहिए क्योकि अगर हम ही एक दुसरे को नहीं समझेंगे तो कोई और क्या समझेगा. दूसरी औरतों को dominate करने की जगह एक दुसरे का साथ दें . पश्चिमी सभ्यता गलत नहीं है. हमे सही और गलत का फर्क करना आना चाहिए क्योकि अच्छे और बुराई हर चीज में होती है. ये हमारी समझ पे निर्भर है कि हम किन चीजों से अच्छी बाते सीखते है और किनसे बुरी.

 तो ये थी अंजली सिंह जिन्होंने बिलकुल बिंदास होकर अपने ज़िन्दगी की कुछ बातों और अनुभव से हमें दो चार कराया. और एक नजरिया दिया कि आम लोगों की लाइफ भी काफी हप्पेनिंग हो सकती है बस ज़रूरत है तो थोडा adventurous  होने की .






Saturday, 14 February 2015

Meri shiqayat Jeevan se...

जीवन एक ऐसा सफर है जो हमारे जन्म से एक दास्ताँ की शुरुआत करता है और एक किताब की तरह बयान  करता है। यूँ तो सरल नहीं है जीवन को परिभाषित करना लेकिन ये हमारे ज़िन्दगी के भोगे हुए घटनाक्रमों का सार है। धर्म-ग्रंथों में और कई लेखक और कवियों ने इसका तरह-तरह का विश्लेषण किया है और भिन्न-भिन्न परिभाषायें रची है और मेरे हिसाब से ये हमारी सत्य-कथा का साक्षी है जिसमे मेरी इससे बहुत सी शिकायतें है। जीवन के उतार-चढ़ाव् में हमे कहीं न कहीं ये आहत कर ही देता है और हम शिकायत सी करने लगते है  आखिर क्यों ?
मेरे लिए मेरा जीवन मेरी कई शिकायतों का चिठ्ठा या खर्रा है जिसमे मेरी अनेक शिकायतें है जो की मेरी आत्म-ग्लानि भी है की क्यों नहीं जीवन ने सही समय पर वेक अप  कॉल मारी।ताकि हम संभल सके। मेरी एक शिकायत ये भी है की क्यों हमे हर पथ का ज्ञान बड़े निर्मम रवैया अपना कर सिखाता है एक क्रूर हेडमास्टर की तरह। आज की सदी में मनुष्य सुख और शांति की तलाश कर रहा है और उसे ये मिलता है तो दुनिया की वस्तुओं और विलासिताओं  के उपभोग से जैसे की गैजेट्स,मनोरंजन जैसे की टीवी ,शॉपिंग आदि भोगो-रसों में। ये सब आज की पिढी चाहती है इससे  उन्हें ख़ुशी मिलती है  मुझे भी मिलती है लेकिन क्या ये स्थायी होता है या क्षणिक कभी सोचा है आपने ?इसका जवाब आप सब बेशक जानते होंगे ये सब तो मोह-माया है और कोई मूल आवश्यकता नही,इन सब के बिना भी एक शांतिपूर्ण और सुखमय जीवन काटा जा सकता है। फिर क्यों कुछ क्षण के सुख के साधनो को पाने के लिए अधीर हो जाते हैं ?और ये सब जानने के बावजूद हमे ये ना मिल पाये तो क्यों हमे अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है ?जबकि ये सब तो एक स्टेटस का सिंबल है। अगर हम जरा गौर फरमाएं तो हम या हमारे मित्रजन को कई  बार गंभीर हो कर ये कहते होंगे की यार मेरी तो कोई लाइफ ही नही है। इन् सुविधाओं और साधनों की महत्ता इतनी बढ़ गयी है की ये जीवन का आधार या बिम्ब बन गए हैं !
  इनका आभाव यानी स्टेटस को आज के समय के माक़ूल ना रख पाना ज़िन्दगी को नीरस सा कर देता  है जैसे की पतझड़ में पेड़ पत्तियों से विहीन हो जाते है और उसपे आश्रित पशु-पक्षियों को भी दिक्कतें होती है। 
हम थोड़े समय के लिए खुश होते हैं जब ये वास्तु आदि हमे प्राप्त हो जाती है और फिर ये चीज़ें रोज़ का मामला हो जाती है और फिर नई इक्षाएं जन्म लेती है और हम फिर वही स्थिति पर नहीं पहुंच जाते हैं?ये कैसा दुषचक्र  है जीवन का। और दूसरी तरफ जब इक्षाएं अतृप्त रह जाती हैं तब भी जीवन दुखी व्यतीत होता है और किसी भी अवस्था में एक स्थायी सुख का बोध नही हो पाता है ये जीवन हमारे साथ कैसी फिरकी ले रहा है ?
मानव हो कर भी हम कुछ सत्य को जान कर भी क्यों उससे अनभिज्ञ बने रहते है और उसे स्वीकार करने में हिचक सी क्यों महसूस करते हैं। सब कुछ नश्वर है,हम सब खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही चले जाना है उन सब प्रिय वस्तुओं का त्याग तो करना ही होगा जिससे हम बेपनाह मोह करते है ,जिनको पाने के लिए पग-पग पर जीवन की चुनौतियां से भिड़ते रहे। और अगर स्थायी खुशियों की बात करें तो कुछ सिद्ध पुरुष अथवा महापुरुषों कह गए हैं की अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना आना चाहिए तभी हम संतोष को प्राप्त कर सकते हैं और वो अनुभूति स्थायी होगी। अगर हम ऐसा कर भी लेते हैं तो हम कोई संत या तपस्वी की भाँती रहे वहु उचित होगा क्यूंकि हम इस सामाजिक जीवन के लायक ही नहीं रहेंगे। यह कैसा जीवन है जिसने हमे ऐसे मझधार में फसा दिया है। 
जीवन से मेरे कई प्रश्न परस्पर होते रहे है। यह केवल प्रश्न नही बल्कि प्रश्न के रूप में मेरी शिकायतें जो शायद अनसुनी सी  हो और इनके उत्तर के तलाश है मुझे।