लखनऊ हमेशा से ही जाना गया है अपनी तहज़ीब के लिए ,वो सभ्यता जिसे हम गंगा-जामुनी तहज़ीब भी कहते है । वो तहज़ीब जो उत्तर भारत के गंगा और यमुना नदी के बीच में बसे मैदानी इलाकों में प्रचलित है। प्राचीन अवध इस तहज़ीब का केंद्रबिंदु रहा है और यहाँ के नवाब इसके अग्रणी। इस तहज़ीब में लोगो के अंदर दुसरो के प्रति असीम आदर और सेवा भाव होता था जो की शाब्दिक होने के साथ साथ उनके आचरण में भी शामिल था। अवधी तहज़ीब जिसे आज लखनवी तहज़ीब भी कहा जाता है वो काफी प्रचलित है और इसका ज़िक्र कई कहानियो और फिल्मों में भी हुआ है जैसे की उमराव जान जिसमे इस शहर की पुरानी विरासत का बखूबी प्रदर्शन किया गया है । जो आज इसके प्रचलन की मुख्य वजह है,जी हाँ प्राचीन अवध की इस धरोहर का अंगीकार यहाँ की तवायफों की बेशकीमती अमानत थी ।
इस शहर का बाशिंदा होने के नाते मैं यहाँ के माहौल से काफी हद तक परिचित हूँ। बहुत फर्क है आज कि तहज़ीब में और उस लखनवी तहज़ीब में जो किताबों में कैद है और एक नयी पश्चिम प्रभावित आधुनिक सभ्यता ने इसकी जगह ले ली है जिसमे गालियाँ देना आम मजाक का हिस्सा है और टेक्सटिंग की भाषा ने यहां की भाषा की नफासत को गायब कर दिया है। आज के लखनऊ ने उस तहज़ीब को मानो त्याग दिया है …… पूरी तरह तो नहीं लेकिन दुर्लभ हो गयी है वह तहज़ीब। मैंने शहर की भीड़-भाड़ में लोगो छोटी-छोटी बातों पर तुरंत अपना आपा खोते,अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखा है .... अब तो बड़ा आम हो गया है ये सब। ये वही शहर है जहाँ जनाब ,हुज़ूर और आप कर के संबोधित करने की सभ्यता थी और जहाँ नवाबों की ट्रेन छूट जाती थी पहले आप .... पहले आप के चक्कर में। ये भावना थी जो नवाबों द्वारा प्रचलित हुई जो हिन्दू,उर्दू ,फ़ारसी और अरबी सभ्यताओं के मिलान से बनी थी और आज इसकी मिठास लुप्त होने जैसी मालूम पड़ती है।
यह कैसे हो गया .... उस शहर में जो इतना शांतिप्रिय और शानदार आचरण का प्रत्यक्षीकरण करता था वो कुछ ही दशकों में अपनी पहचान खो देगा जो इसकी धरोहर है। शायद यह होना ही था इस शहर को बदलना ही था क्यूंकि कुछ भी स्थायी नहीं होता और समय परिवर्तन लाता ही है ,अवध जो इतनी परिपूर्ण सभ्यता रखता था वो अब उसे खो ही सकता था ……ये वही सभ्यता है जहाँ रूमी दरवाज़ा जैसा इतिहास पला है जिसे नवाब बारामबार बनवाकर ज़मींदोज़ करवा देते थे सिर्फ इसलिए ताकि मज़दूरों को रोज़गार मिल सके। आज तो ऐसी पहल की उम्मीद भी नहीं की जा सकती और आज का माहौल काफी स्पर्धाओं से भरा है और लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और बरसों से चली आ रही सभ्यता को भूल बैठे हैं। आज इस सभ्यता का मजाक बन कर रह गया है लोग इसको बेवकूफी मानते हैं ,हमें आज ज़रूरत है इसे जीवित रखने की चाहे दूसरे लोग कैसे भी हो ,या ये सोच लीजिये ये हमारी सभ्यता है और इसकी महत्ता हमे ही समझनी होगी क्यूंकि अगर हम ही संशय में होंगे तो इसका फना हो जाना तय है।
इस शहर का बाशिंदा होने के नाते मैं यहाँ के माहौल से काफी हद तक परिचित हूँ। बहुत फर्क है आज कि तहज़ीब में और उस लखनवी तहज़ीब में जो किताबों में कैद है और एक नयी पश्चिम प्रभावित आधुनिक सभ्यता ने इसकी जगह ले ली है जिसमे गालियाँ देना आम मजाक का हिस्सा है और टेक्सटिंग की भाषा ने यहां की भाषा की नफासत को गायब कर दिया है। आज के लखनऊ ने उस तहज़ीब को मानो त्याग दिया है …… पूरी तरह तो नहीं लेकिन दुर्लभ हो गयी है वह तहज़ीब। मैंने शहर की भीड़-भाड़ में लोगो छोटी-छोटी बातों पर तुरंत अपना आपा खोते,अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखा है .... अब तो बड़ा आम हो गया है ये सब। ये वही शहर है जहाँ जनाब ,हुज़ूर और आप कर के संबोधित करने की सभ्यता थी और जहाँ नवाबों की ट्रेन छूट जाती थी पहले आप .... पहले आप के चक्कर में। ये भावना थी जो नवाबों द्वारा प्रचलित हुई जो हिन्दू,उर्दू ,फ़ारसी और अरबी सभ्यताओं के मिलान से बनी थी और आज इसकी मिठास लुप्त होने जैसी मालूम पड़ती है।
यह कैसे हो गया .... उस शहर में जो इतना शांतिप्रिय और शानदार आचरण का प्रत्यक्षीकरण करता था वो कुछ ही दशकों में अपनी पहचान खो देगा जो इसकी धरोहर है। शायद यह होना ही था इस शहर को बदलना ही था क्यूंकि कुछ भी स्थायी नहीं होता और समय परिवर्तन लाता ही है ,अवध जो इतनी परिपूर्ण सभ्यता रखता था वो अब उसे खो ही सकता था ……ये वही सभ्यता है जहाँ रूमी दरवाज़ा जैसा इतिहास पला है जिसे नवाब बारामबार बनवाकर ज़मींदोज़ करवा देते थे सिर्फ इसलिए ताकि मज़दूरों को रोज़गार मिल सके। आज तो ऐसी पहल की उम्मीद भी नहीं की जा सकती और आज का माहौल काफी स्पर्धाओं से भरा है और लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और बरसों से चली आ रही सभ्यता को भूल बैठे हैं। आज इस सभ्यता का मजाक बन कर रह गया है लोग इसको बेवकूफी मानते हैं ,हमें आज ज़रूरत है इसे जीवित रखने की चाहे दूसरे लोग कैसे भी हो ,या ये सोच लीजिये ये हमारी सभ्यता है और इसकी महत्ता हमे ही समझनी होगी क्यूंकि अगर हम ही संशय में होंगे तो इसका फना हो जाना तय है।
No comments:
Post a Comment