Wednesday, 8 April 2015

कहाँ ले जाएगा ये पहिया ........................................

पहिये का नाम जहन मे जब आता है तो एक तस्वीर सी दिमाग में ताज़ा हो जाती है .....एक बैलगाड़ी ,कच्चा रास्ता और उसमे लदा माल या धान जो चालक एक जगह से दूसरी जगह ले जाता है बेचने के लिए । अब ये कार्य एक व्यक्ति जो चालक है वो भी अपने कंधों पर ढो सकता है लेकिन उसकी सीमाएं होंगी समय भी ज्यादा लगेगा, श्रम भी अधिक हो जाएगा उसके लिए । पहिये के आ जाने से जीवन के कार्य मे गति मिली है हमे ,कार्य करने  की क्षमता मे वृद्धि हुई और लक्ष्य को प्राप्त करना सफल हुआ ।
            उसी प्रकार जीवन मे आगे बढ्ने के लिए अपनी इच्छाए,उमंगों  और  महत्वाकांक्षाओं को पोषित करने मे हमे पहिये की जरूरत पड़ती है । आज के समाज मे शिक्षा को सफलता का पहिया माना गया है ,सही भी है क्यूंकी शिक्षा ही हमे योग्य और संतुलित बनाती है । सामन्य प्राथमिक शिक्षा तो सबका संवैधानिक अधिकार है , लेकी उच्च शिक्षा की महत्ता ज्यादा है । क्योंकि हाईस्कूल और इंटर मिडिएट तक तो शिक्षा केवल नंबर का खेल ज्यादा रहती है उसके बाद की शिक्षा ज्ञान अर्जित करने वाली होती है , और ये समय हमारे जीवन का वो समय है जब हम योग्य चालक बन रहे होते हैं यही से मिलती है हमारी जिंदगी को रफ्तार । अब विडम्बना ये है की हमारे हाथ मे सब कुछ तो नहीं या ये भी कह सकते है ,............ कि हमारे हाथ मे कुछ भी नहीं ...........क्योंकि बहुत कुछ निर्भर करता है ,हमारे परिवेश ,आर्थिक स्तिथि ,और शिक्षण संस्थान और प्रणाली पर । क्या ये मामले हमारी गाड़ी कि चाल  मे गति अवरोधक बने हुए हैं ? बहुत हद तक हाँ .......... ये चिन्हित कारणो से हमारी गाड़ी ना चाहते हुए भी रुकती है । हम किसी तरह से अपने परिवेश और आर्थिक जकड़न से पार पाकर आगे अग्रसर हो भी आए तो हम शिक्षण संस्थान और उनकी व्यवस्था के हवाले हो जाते हैं , जहां पर भी खतरा है ..... कई प्रकार के खतरे । कालेज और विश्वविद्यालयों मे प्रवेश के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को मेरिट ना व्के कारण बैरंग लौटा दिया जाता है ,और कई विश्वविद्यालय तो ऐसी कट ऑफ घोषित करते हैं जो बिलकुल निराधार है । इस कठिन पड़ाव को भी कुछ जुझारू छात्र पार भी कर ले तो लाचार शिक्षा प्रशासन और व्यवस्था का लुत्फ उठाने को मजबूर होते हैं ,वो और कर भी क्या सकते हैं ।
            लचरता और  ढीलेपन का आलम ये है की क्लास सुचारु रूप से नहीं चलती ,और छात्र अपने घर के आराम को छोडकर यहाँ रह रहे हैं पढ़ने के लिए तो वहाँ उनका स्वागत खाली क्लासेस करती हैं , शिक्षक तो आते नहीं ,और गलती से  आ गए तो टहल घूम रहे होते , या स्टाफ रूम  मे गप्प लड़ा रहे होते हैं ..........ऐसा मालूम पड़ता है की पढ़ाना उनका काम नहीं ,और पढ़ाने भी कभी आए तो टाइम पास करते हैं ,और 5-10 मिनट पढ़ा कर अहसान कर देते थे । दुख की बात ये भी है की कोई सुनवाई नहीं होती , और छात्रों मे भी रोष पैदा होता है ।
             और इसका दूसरा पहलू , छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति को लेकर है जहां सरकार गरीब छात्रों की पढ़ाई का खर्चा उठाने को तैयार है , वही कालेज वाले और उससे संबन्धित अधिकारी मिल कर उसमे भी घपला कर जाते हैं जिससे गरीब छात्र उच्च शिक्षा से वंचित हो जाते हैं । इसमे दोष छत्रों का भी बराबर का होता है जो इसका विरोध ठीक से नहीं कर पाते हैं , टुंट पुजिए छात्र नेताओं के चककर मे पड़कर अपना भविष्य खराब कर देते हैं ।
             शिक्षा व्यवस्था के इस लचर स्वरूप को देखते हुए छात्रों के , कैरियर के सफर पर ग्रहण लगता जा रहा है । तो इस सफर का पहिया भी कमजोर होता जा रहा है । इस कमजोर पहिये के डैम पर देश कितनी प्रगति करेगा ये भी संशय है ।

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