Sunday, 19 April 2015

फना सी होती तहज़ीब........

लखनऊ हमेशा से ही जाना गया है अपनी तहज़ीब के लिए ,वो सभ्यता जिसे हम गंगा-जामुनी तहज़ीब भी कहते है और ये वो तहज़ीब है जो उत्तर भारत के मैदानी इलाके हैं जो गंगा और यमुना नदी के बीच में बसे  है। अवध इस तहज़ीब का केंद्रबिंदु रहा है और यहाँ के नवाब इसके अग्रणी। इस तहज़ीब में लोगो के अंदर दुसरो के प्रति असीम आदर और सेवा भाव होता था जो की शाब्दिक होने के साथ साथ उनके आचरण में भी शामिल था। अवधी तहज़ीब जिसे आज लखनवी तहज़ीब कहा जाता है काफी प्रचलित है और इसका ज़िक्र कई कहानियो और फिल्मों में भी हुआ है जैसे की उमराओ जान जिसमे शहर की पुरानी विरासत को दर्शाया गया है।
इस शहर का बाशिंदा होने के नाते मैंने यहाँ के माहौल से काफी हद तक परिचित हूँ।  बहुत फर्क है आज कि तहज़ीब में और उस लखनवी तहज़ीब में जो किताबों में कैद है और  एक नयी पश्चिम प्रभावित आधुनिक सभ्यता ने इसकी जगह ले ली है जिसमे गालियाँ देना आम मजाक का हिस्सा है और टेक्सटिंग की भाषा ने यहां की भाषा की नफासत को गायब कर दिया है। आज के लखनऊ ने उस तहज़ीब को मानो त्याग दिया है …… पूरी तरह तो नहीं लेकिन दुर्लभ हो गयी है वह तहज़ीब। मैंने शहर की भीड़-भाड़ में लोगो छोटी-छोटी बातों पर तुरंत अपना आपा खोते,अभद्र भाषा का प्रयोग करते देखा है  .... अब तो बड़ा आम हो गया है ये सब।  ये वही शहर है जहाँ जनाब ,हुज़ूर और आप कर के सम्भोधित करने की सभ्यता थी और जहाँ नवाबों की ट्रेन छूट जाती थी पहले आप .... पहले आप के चक्कर में। ये भावना थी जो नवाबों द्वारा प्रचलित हुई जो हिन्दू,उर्दू ,फ़ारसी और अरबी सभ्यताओं के मिलान से बनी है। शायद इसी लिए इसमें इतनी मिठास और मधुरता है जो आज लुप्त हो रही है।
यह कैसे हो गया .... उस शहर में जो इतना शांतिप्रिय और शानदार आचरण का प्रत्यक्षीकरण करता था वो कुछ ही दशकों में अपनी पहचान खो देगा जो इसकी धरोहर है। शायद यह होना ही था इस शहर को बदलना ही था क्यूंकि कुछ भी स्थायी नहीं होता और समय परिवर्तन लाता ही है ,अवध जो इतनी परिपूर्ण सभ्यता रखता था वो अब उसे खो ही सकता था ……ये वही सभ्यता है जहाँ रूमी दरवाज़ा का इतिहास पला है जो नवाब बार बार बनवाकर तुड़वा देते थे सिर्फ इसलिए ताकि मज़दूरों को रोज़गार मिल सके। आज तो ऐसी पहल की उम्मीद भी नहीं की जा सकती और आज का माहौल काफी स्पर्धाओं से भरा है और लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं और बरसों से चली आ रही सभ्यता को भूल बैठे हैं। आज इस सभ्यता का मजाक बन कर रह गया है लोग इसको बेवकूफी मानते हैं ,हमें आज ज़रूरत है इसे जीवित रखने की चाहे दूसरे लोग कैसे भी हो ,या ये सोच लीजिये ये हमारी सभ्यता है और इसकी महत्ता हमे ही समझनी होगी क्यूंकि अगर हम ही संशय में होंगे तो इसका फना हो जाना तय है। 

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