जीवन एक ऐसा सफर है जो हमारे जन्म से एक दास्ताँ की शुरुआत करता है और एक किताब की तरह बयान करता है। यूँ तो सरल नहीं है जीवन को परिभाषित करना लेकिन ये हमारे ज़िन्दगी के भोगे हुए घटनाक्रमों का सार है। धर्म-ग्रंथों में और कई लेखक और कवियों ने इसका तरह-तरह का विश्लेषण किया है और भिन्न-भिन्न परिभाषायें रची है और मेरे हिसाब से ये हमारी सत्य-कथा का साक्षी है जिसमे मेरी इससे बहुत सी शिकायतें है। जीवन के उतार-चढ़ाव् में हमे कहीं न कहीं ये आहत कर ही देता है और हम शिकायत सी करने लगते है आखिर क्यों ?
मेरे लिए मेरा जीवन मेरी कई शिकायतों का चिठ्ठा या खर्रा है जिसमे मेरी अनेक शिकायतें है जो की मेरी आत्म-ग्लानि भी है की क्यों नहीं जीवन ने सही समय पर वेक अप कॉल मारी।ताकि हम संभल सके। मेरी एक शिकायत ये भी है की क्यों हमे हर पथ का ज्ञान बड़े निर्मम रवैया अपना कर सिखाता है एक क्रूर हेडमास्टर की तरह। आज की सदी में मनुष्य सुख और शांति की तलाश कर रहा है और उसे ये मिलता है तो दुनिया की वस्तुओं और विलासिताओं के उपभोग से जैसे की गैजेट्स,मनोरंजन जैसे की टीवी ,शॉपिंग आदि भोगो-रसों में। ये सब आज की पिढी चाहती है इससे उन्हें ख़ुशी मिलती है मुझे भी मिलती है लेकिन क्या ये स्थायी होता है या क्षणिक कभी सोचा है आपने ?इसका जवाब आप सब बेशक जानते होंगे ये सब तो मोह-माया है और कोई मूल आवश्यकता नही,इन सब के बिना भी एक शांतिपूर्ण और सुखमय जीवन काटा जा सकता है। फिर क्यों कुछ क्षण के सुख के साधनो को पाने के लिए अधीर हो जाते हैं ?और ये सब जानने के बावजूद हमे ये ना मिल पाये तो क्यों हमे अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है ?जबकि ये सब तो एक स्टेटस का सिंबल है। अगर हम जरा गौर फरमाएं तो हम या हमारे मित्रजन को कई बार गंभीर हो कर ये कहते होंगे की यार मेरी तो कोई लाइफ ही नही है। इन् सुविधाओं और साधनों की महत्ता इतनी बढ़ गयी है की ये जीवन का आधार या बिम्ब बन गए हैं !
इनका आभाव यानी स्टेटस को आज के समय के माक़ूल ना रख पाना ज़िन्दगी को नीरस सा कर देता है जैसे की पतझड़ में पेड़ पत्तियों से विहीन हो जाते है और उसपे आश्रित पशु-पक्षियों को भी दिक्कतें होती है।
हम थोड़े समय के लिए खुश होते हैं जब ये वास्तु आदि हमे प्राप्त हो जाती है और फिर ये चीज़ें रोज़ का मामला हो जाती है और फिर नई इक्षाएं जन्म लेती है और हम फिर वही स्थिति पर नहीं पहुंच जाते हैं?ये कैसा दुषचक्र है जीवन का। और दूसरी तरफ जब इक्षाएं अतृप्त रह जाती हैं तब भी जीवन दुखी व्यतीत होता है और किसी भी अवस्था में एक स्थायी सुख का बोध नही हो पाता है ये जीवन हमारे साथ कैसी फिरकी ले रहा है ?
मानव हो कर भी हम कुछ सत्य को जान कर भी क्यों उससे अनभिज्ञ बने रहते है और उसे स्वीकार करने में हिचक सी क्यों महसूस करते हैं। सब कुछ नश्वर है,हम सब खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही चले जाना है उन सब प्रिय वस्तुओं का त्याग तो करना ही होगा जिससे हम बेपनाह मोह करते है ,जिनको पाने के लिए पग-पग पर जीवन की चुनौतियां से भिड़ते रहे। और अगर स्थायी खुशियों की बात करें तो कुछ सिद्ध पुरुष अथवा महापुरुषों कह गए हैं की अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना आना चाहिए तभी हम संतोष को प्राप्त कर सकते हैं और वो अनुभूति स्थायी होगी। अगर हम ऐसा कर भी लेते हैं तो हम कोई संत या तपस्वी की भाँती रहे वहु उचित होगा क्यूंकि हम इस सामाजिक जीवन के लायक ही नहीं रहेंगे। यह कैसा जीवन है जिसने हमे ऐसे मझधार में फसा दिया है।
जीवन से मेरे कई प्रश्न परस्पर होते रहे है। यह केवल प्रश्न नही बल्कि प्रश्न के रूप में मेरी शिकायतें जो शायद अनसुनी सी हो और इनके उत्तर के तलाश है मुझे।
इनका आभाव यानी स्टेटस को आज के समय के माक़ूल ना रख पाना ज़िन्दगी को नीरस सा कर देता है जैसे की पतझड़ में पेड़ पत्तियों से विहीन हो जाते है और उसपे आश्रित पशु-पक्षियों को भी दिक्कतें होती है।
हम थोड़े समय के लिए खुश होते हैं जब ये वास्तु आदि हमे प्राप्त हो जाती है और फिर ये चीज़ें रोज़ का मामला हो जाती है और फिर नई इक्षाएं जन्म लेती है और हम फिर वही स्थिति पर नहीं पहुंच जाते हैं?ये कैसा दुषचक्र है जीवन का। और दूसरी तरफ जब इक्षाएं अतृप्त रह जाती हैं तब भी जीवन दुखी व्यतीत होता है और किसी भी अवस्था में एक स्थायी सुख का बोध नही हो पाता है ये जीवन हमारे साथ कैसी फिरकी ले रहा है ?
मानव हो कर भी हम कुछ सत्य को जान कर भी क्यों उससे अनभिज्ञ बने रहते है और उसे स्वीकार करने में हिचक सी क्यों महसूस करते हैं। सब कुछ नश्वर है,हम सब खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही चले जाना है उन सब प्रिय वस्तुओं का त्याग तो करना ही होगा जिससे हम बेपनाह मोह करते है ,जिनको पाने के लिए पग-पग पर जीवन की चुनौतियां से भिड़ते रहे। और अगर स्थायी खुशियों की बात करें तो कुछ सिद्ध पुरुष अथवा महापुरुषों कह गए हैं की अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करना आना चाहिए तभी हम संतोष को प्राप्त कर सकते हैं और वो अनुभूति स्थायी होगी। अगर हम ऐसा कर भी लेते हैं तो हम कोई संत या तपस्वी की भाँती रहे वहु उचित होगा क्यूंकि हम इस सामाजिक जीवन के लायक ही नहीं रहेंगे। यह कैसा जीवन है जिसने हमे ऐसे मझधार में फसा दिया है।
जीवन से मेरे कई प्रश्न परस्पर होते रहे है। यह केवल प्रश्न नही बल्कि प्रश्न के रूप में मेरी शिकायतें जो शायद अनसुनी सी हो और इनके उत्तर के तलाश है मुझे।
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